Saturday, August 11, 2007

संकुचित मानसिकता -लड़के कि आस

लड़के की आस

वंश बढाने की प्यास

अंकुरित होते बीज की ख़त्म कर देती है साँस
एक अंकुरित पौधा हो जाता है नष्ट
पर क्या बुझ पाती है प्यास



यूं संकुचित मानसिकता का आविर्भाव

जन्म देता है कितने दुर्भाव

सोच की धारा का रूक जाता है बहाव

जीवन का बस रह जाता है एक ही पड़ाव

वंश का कैसे हो फैलाव



यही पड़ाव तो है एक भँवर
यहीं विलीन हो जाती है सोचों की लहर

जिसमे ख़त्म हो जाता है जिन्दगी का सफ़र

कन्या भ्रूण ह्त्या की सोच बन जाती है ज़हर



अनिता नि:शब्द

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