लड़के की आस
वंश बढाने की प्यास
अंकुरित होते बीज की ख़त्म कर देती है साँस
एक अंकुरित पौधा हो जाता है नष्ट
पर क्या बुझ पाती है प्यास
यूं संकुचित मानसिकता का आविर्भाव
जन्म देता है कितने दुर्भाव
सोच की धारा का रूक जाता है बहाव
जीवन का बस रह जाता है एक ही पड़ाव
वंश का कैसे हो फैलाव
यही पड़ाव तो है एक भँवर
यहीं विलीन हो जाती है सोचों की लहर
जिसमे ख़त्म हो जाता है जिन्दगी का सफ़र
कन्या भ्रूण ह्त्या की सोच बन जाती है ज़हर
अनिता नि:शब्द
Saturday, August 11, 2007
भ्रूण हत्या-प्राक्कथन
हमारे समाज की ज्वलंत समस्या है कन्या भ्रूण कि हत्या और बढती दहेज़ प्रथा कि आग मैं जलती नारियाँ। इस समस्या का समाधान भी स्वयं अपने आप में एक बड़ी समस्या है। अनगिनत समाज सेवी संस्थाएं और अखबारों से जुडे पत्रकार अपने अपने तरीके से कार्य कर रहे हैं। जिससे अपराधी लोगों को सजा मिल सके ,जिससे इस तरह के जानलेवा अपराधिक कार्य करने में लोग डरें और अन्य लोगों में भी जागरूकता आये और वे कन्या भ्रूण कि रक्षा और दहेज़ उन्मूलन अभियान में अपना योगदान दे सकें। हम सबों को अपनी क्षमता के अनुसार लोगों में इस विषय मे इस इस क्षेत्र इस क्षेत्र मै कार्य करना चाहिए। और अगर कोई संस्था या लोग हमारे इस अभियान मै हमारे साथ जुडना चाहते हैं तो हमें बहुत ही प्रसन्नता होगी। उत्साहपूर्वक दो हाथों का साथ सौ हाथों के बराबर है। आप सबों से सहयोग की अपेक्षा रखते हैं।
अनिता नि:शब्द
अनिता नि:शब्द
Subscribe to:
Posts (Atom)